देवका सीफ्रंट रोड और ब्यूटीफिकेशन का 65 करोड का ठेका 92 करोड में दिया गया - Asli Azadi Hindi News paper of Union territory of daman-diu & Dara nagar haveli Asli Azadi Hindi News paper of Union territory of daman-diu & Dara nagar haveli
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  •         Thursday, June 21, 2018
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  • संपादक : विजय भट्ट सह संपादक : संजय सिंह । सीताराम बिंद
  • देवका सीफ्रंट रोड और ब्यूटीफिकेशन का 65 करोड का ठेका 92 करोड में दिया गया
    - दमण में करोडों रुपये के टेंडर लगातार 40 प्रतिशत ज्यादा की राशि से दिए जाने से उठ रहे है सवाल
    - मेसर्स आर. के. सी. इन्फ्राबिल्ट प्राइवेट लिमिटेड की फिर एक बार बल्ले-बल्ले - गुजरात शिड्युल रेट (जीएसआर) लागू होने के बाद टेंडर 40 प्रतिशत से उपर जाना दिल्ली शिड्युल रेट से भी 20 से 25 प्रतिशत ज्यादा - सडक के लिए मिट्टी दमण के तालाबों की और प्रशासन नहीं ले रहा है रॉयल्टी
    दमण 10 जून। केन्द्रशासित प्रदेश दमण में टेंडर प्राप्त करने वाली कंपनियां काम की लागत (वर्क एस्टीमेट) से 40 प्रतिशत से ज्यादा लगातार भर रही है और लगातार दमण प्रशासन 40 प्रतिशत से उपर कंपनियों को ठेका दे रहा है। ऐसे ही एक जानकारी देवका के सिर्फ 6 किलोमीटर की सडक और ब्यूटीफिकेशन का ठेका लगभग 65 करोड की काम की लागत (वर्क एस्टीमेट) के सामने 41.87 प्रतिशत उपर यानि की लगभग 92 करोड में दिया गया है। यह ठेका फिर एक बार मेसर्स आर. के. सी. इन्फ्राबिल्ट प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया है। यहां सवाल यह उठता है कि दिल्ली शिड्युल रेट (डीएसआर) को 2017 में बंद कर दमण-दीव के लिए पडोसी राज्य गुजरात के गुजरात शिड्युल रेट (जीएसआर) को लागू किया गया था। उस वक्त कहा गया था कि दमण-दीव में विकास प्रोजेक्टों का खर्चा 30 से 40 प्रतिशत कम हो जायेगा। यानि की उस वक्त डीएसआर के तहत कोई प्रोजेक्ट का एस्टीमेट के बाद 1 करोड का काम जीएसआर के तहत 60 लाख में हो जाना चाहिए था। लेकिन वर्तमान कुछ टेंडरों पर नजर डाले तो मामला पूरा उल्टा पडता दिख रहा है। क्योंकि जीएसआर के तहत निकाले गये टेंडर अगर मूल एस्टीमेट के बाद 40 प्रतिशत से ज्यादा उपर खुलते है तो यह राशि डीएसआर एस्टीमेट से भी 20 से 25 प्रतिशत ज्यादा है। दूसरे शब्दों में कहे तो डीएसआर के तहत 1 करोड का काम वर्तमान परिस्थिति में 1 करोड 20 लाख के आसपास पहुंच जाता है। चौंकाने वाली बात यह है कि दमण-दीव एवं दानह प्रशासन के पीडब्ल्यूडी के ज्यादातर टेंडर 30 प्रतिशत से लेकर 50 प्रतिशत तक उपर खुल रहे है। जिसका सीधा मतलब है कि एस्टीमेट से 5 प्रतिशत से ज्यादा उपर जाना कही न कही आशंकाएं खडी करता है। दमण-दीव और दानह की आमजनता प्रशासन की वेबसाइट पर जाकर करोडों रुपये के ठेके किसे दिये जा रहे है? कितनी ज्यादा राशि में दिये जा रहे है? कौन कंपनी ज्यादातर ठेका ले रही है? यह सभी बाते खोजने वाली नहीं है। जनता को इस बात से भी सरोकार नहीं है कि 65 करोड का एस्टीमेट दमण पीडब्ल्यूडी के विद्वान इंजीनियरों ने गुजरात के चीफ इंजीनियर के साथ मिलकर तैयार किया था। फिर उस एस्टीमेट से 41.87 प्रतिशत ज्यादा लागत ठेका लेनेवाली कंपनी क्यों क्वोट कर रही है। बता दें कि दमण-दीव के लिए भारत सरकार ने विकास कायार्ें के लिए अपनी तिजोरी खोल दी है। ऐसे में संघ प्रदेशों में 50 करोड, 100 करोड, 200 करोड के बडे प्रोजेक्ट शुरु किये गये है। लेकिन प्रशासन को जनता के सामने इस बात का खुलासा करना पडेगा कि अगर सही में देवका जैसे प्रोजेक्ट 92 करोड की लागत के थे तो फिर 65 करोड का एस्टीमेट कैसे बना? पिछले 1 साल में लगातार दोनों केन्द्रशासित प्रदेशों के टेंडर 40 प्रतिशत की लक्ष्मण रेखा लगातार पार क्यों कर रहे है? महज 6 किलोमीटर की सडक ब्यूटीफिकेशन के साथ 92 करोड में तो जंपोर तक का पूरा खर्चा कितना होगा? यहां प्रशासन को इस बात का भी खुलासा करना चाहिए कि ग्राम पंचायतों के तालाबों की मिट्टी ठेका लेनेवाली कंपनी को दी जा रही है तो उस मिट्टी की रॉयल्टी वसूली जा रही है या नहीं? समुद्र किनारे सडक बनाने के लिए सबसे ज्यादा खर्चा मिट्टी भरने का ही होता है। ऐसे में मिट्टी जब प्रशासन दे रहा है तो टेंडर नीचे खुलना चाहिए लेकिन उसके स्थान पर 41.87 प्रतिशत उपर कैसे चला गया?
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