दमण-दीव एवं दादरा नगर हवेली में आजादी से 2013 तक निजी जमीनों पर बनी सडकों के नवनिर्माण पर रोक हटाना जरुरी - Asli Azadi Hindi News paper of Union territory of daman-diu & Dara nagar haveli Asli Azadi Hindi News paper of Union territory of daman-diu & Dara nagar haveli
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  •         Saturday, September 23, 2017
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  • संपादक : विजय भट्ट सह संपादक : संजय सिंह । सीताराम बिंद
  • दमण-दीव एवं दादरा नगर हवेली में आजादी से 2013 तक निजी जमीनों पर बनी सडकों के नवनिर्माण पर रोक हटाना जरुरी
    - गरीब, दलित और आदिवासियों के घरों तक पक्की सडक बनाने में प्रशासन का आदेश बाधक - 9 अगस्त 2017 को आदिवासी दिवस पर प्रशासक प्रफुल पटेल के समक्ष आदिवासियों ने घर-घर तक छोटी-छोटी सडकें बनाने की रखी थी मांग - प्रशासक प्रफुल पटेल से गरीब, दलित और आदिवासियों को उम्मीद - दमण-दीव में 1961 से पहले और दादरा नगर हवेली में 1954 से पहले जिन सार्वजनिक सडकों को गरीब, दलित और आदिवासी इस्तेमाल करते थे अब उन सडकों के नवीनीकरण से पहले उन सडकों के जमीन मालिक की एनओसी या सडक को प्रशासन के नाम पर करने का है आदेश - दमण-दीव में 350 के आसपास और दादरा नगर हवेली में 530 के आसपास ऐसी सडकें होगी जिसे जनता दशकों से इस्तेमाल करती है लेकिन उस सडक की जमीन निजी नामों पर दर्ज है प्रशासन ने 2013 तक ऐसी सडकों का मरम्मतीकरण या नवीनीकरण किया है प्रशासन का इस मुद्दे पर लचीला रुख जरुरी
    असली आजादी ब्यूरो, दमण/सिलवासा। देश की आजादी के 7 साल बाद आजाद होने वाले दादरा नगर हवेली और 14 साल के बाद आजाद होने वाले दमण-दीव की गरीब, दलित एवं आदिवासी जनता तत्कालीन आईएएस अधिकारी के आदेश के चलते अपने घर तक पहुंचने वाली सडक की सुविधा से वंचित हो रही है। दमण-दीव एवं दादरा नगर हवेली में प्रशासन एवं स्थानीय स्वराज संस्थाओं द्वारा पिछले 50 सालों से जो सडकेें बनाई गई थी उन सडकों के मरम्मतीकरण एवं नवीनीकरण पर यह कहते हुए रोक लगा दी गई कि यह सडकें निजी मालिकों के नाम पर है। उस पर सरकारी धन खर्च नहीं हो सकता है। 2013 में तत्कालीन आईएएस अधिकारियों ने यह आदेश तो कर दिया लेकिन उस आदेश का खामियाजा सिर्फ और सिर्फ गरीब, दलित एवं आदिवासियों को भुगतना पडा। क्योंकि दमण-दीव एवं दादरा नगर हवेली में गरीबों के घर तक उनके नाम पर नहीं है। उनके घरों तक पहंुचने वाली सडकेें कई दशकों से इस्तेमाल किये जाने के चलते वह सडकें सार्वजनिक सडकें ही बन गई थी। अब प्रशासन कहता है कि जब तक उस सडक के हिस्से की जमीन का मालिक एनओसी नहीं देगा, प्रशासन के नाम जमीन नहीं करेगा तब तक इन सडकों को निजी सडक माना जायेगा। इन सडकों पर सरकारी धन से मरम्मतीकरण एवं नवीनीकरण नहीं हो सकता। दमण-दीव में 350 से अधिक ऐसी सडकें हैं जिन सडकों को कई दशकों से ग्रामीण इस्तेमाल कर रहे हैं। इस तरह दादरा नगर हवेली में भी 530 से ज्यादा ऐसी सडकें होगी जिसे ग्रामीण जनता इस्तेमाल कर रही है। अब सवाल यह उठता है कि दशकों तक इन सडकों पर सरकारी खर्च हो चुका है। इन सडकों को गरीब, दलित और आदिवासी इस्तेमाल कर रहा है ऐसी सूरत में प्रशासन को लचीला रुख अपनाने की जरुरत है। क्योंकि आज की तारीख में ज्यादातर सडकें जिन जमीन मालिकों ने ग्रामीणों के इस्तेमाल के लिए दी थी वह अब इस दुनिया में मौजूद नहीं है। अगर उनके वारिश से एनओसी मांगेंगे तो वे कभी भी एनओसी नहीं देंगे। हो सकता है कि सडक की जमीन पर दावा ठोक कर वही अपना मकान बनाना शुरु कर दे। दमण-दीव एवं दादरा नगर हवेली में गरीबों के चलने वाली सडकों के बारे में अब सही फैसला लेने का समय आ गया है। गौरतलब है कि दमण-दीव एवं दादरा नगर हवेली में शहरी क्षेत्र में यह समस्या नहीं हैै। क्योंकि ज्यादातर शहरी क्षेत्र प्रदेश की मुख्य सडकों एवं म्युनिसिपल सडक से जुडे हुए है। शहर के कुछ क्षेत्रों में तो सोसायटी, रॉ-हाउस एवं बंगला में रहने वालों ने तो पक्की सडक या पेवरब्लॉक लगा लिए हैं। ग्रामीण क्षेत्र में भी जो रसूखदार लोग हैं उनके घर तक पेवरब्लॉक और सडकें बन चुकी हैं। सिर्फ गरीब, दलित और आदिवासी ही प्रशासन के आदेश का खामियाजा भुगत रहे हैं। ऐसे में सभी की उम्मीदें प्रदेश प्रशासक प्रफुल पटेल पर टिकी हुई है। क्योंकि 9 अगस्त 2017 को अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस पर दमण के कार्यक्रम में आदिवासियों ने अपने घर तक छोटी-छोटी सडक बनाने की मांग उठाई थी। प्रशासक प्रफुल पटेल ने आदिवासियों की इस मांग को जल्द पूरा करने के निर्देश अपने अधीनस्थ अधिकारियों को दे दिया था। लेकिन 2013 के विकास आयुक्त का वह आदेश गरीब के घर-घर तक सडक बनाने की मांग के सामने रोडा बना हुआ है। प्रशासन इस रोक को हटाकर ही गरीबों के लिए चलने वाली सडकों का मरम्मतीकरण एवं नवीनीकरण स्थानीय स्वराज संस्थाओं की मदद से कर पायेगा इस बात में कोई दो राय नहीं है।

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